Monday, 27 April 2020

कमाऊ बेटा-बाल गीत --देवेन्द्र कुमार


कमाऊ बेटा—देवेन्द्र कुमार 

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कमाऊ बेटा

दुलारा, आंखों का तारा

लेटा है

यह भी एक ढंग है

कमाने का।

कुछ खास  छोटा भी नहीं

तीन माह, दस दिन का

 

मैली कथरी पर

वह और कुछ सिक्के

कुछ नहीं बोलता

आंख नहीं खोलता

 

रो रही है मां

बाप पीटता है पेट

 ‘ऐ बाबू लोगो!

सौगंध भगवान की

इसके नन्हे कलेजे में

हैं हजार छेद।

इलाज को मिल जाए

पैसा दो पैसा...’

 

किसी ने फेंके कुछ सिक्के

कोई यूं ही गुजर गया

समाज ने बांट लिया उसे

और चाहे कुछ हो न हो

सूखा कुआं

मां-बाप का

जरा तो

गीला हो ही जाएगा!

वह सहे जाएगा

धूप और तपिश

मां-बाप का दुलारा

आंखों का तारा

अभी से बन गया

लाठी

बुढ़ापा मां-बाप का

आए न आए

इसलिए चुप लेटा है

कमाऊ बेटा है।

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Monday, 24 February 2020

बच्चे गए नहीं-बाल कविता-देवेन्द्र कुमार


बच्चे गए नहीं—कविता-देवेन्द्र कुमार

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शाम ढल गई

खिलखिल थम गई

बच्चे चले गए

क्या सच?

 

नहीं वे मौजूद हैं

पेंसिलों की छीलन,

कागजी गोलियों के

झगडे और मेल में

 

घर के अखाडे में

रंगों के पौ बारह

डांट डपट जा बैठी

बचपन की रेल में

 

अब बड़े बोले

करो कूडे की सफाई 

रुक रे बड़प्पन

मैंने फटकार लगाई

 

बाँध कर रखूंगा

जाने नहीं दूंगा

मैं उनमें वे मुझमें

खेलूंगा खेल मैं  

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Saturday, 8 February 2020

देखो देखो फूल खिला-बाल गीत-देवेन्द्र कुमार


देखो देखो फूल खिला—बाल गीत—देवेन्द्र कुमार

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       कूड़े पर एक फूल खिला

       सुंदर पीला फूल खिला
 
       कैसा अद्भुत फूल खिला

       खूब खिला भई खूब खिला

 

       वहाँ गली का कूड़ा पड़ता

       बदबू   छाई   रहती   है

       सब इससे बच कर चलते हैं

       जाने  कैसे  फूल खिला

      

        कोई नहीं देखने वाला

        उसे मिला है देश निकाला

        खूब गंदगी में महका है

        कितना सुंदर फूल खिला

 

                  खूब खिला भई खूब खिला

             अजब अनोखा फूल खिला 

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Sunday, 2 February 2020

बेच रहे गुब्बारे- बाल गीत-देवेन्द्र कुमार


बेच रहे गुब्बारे—बाल गीत—देवेन्द्र कुमार

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बच्चे बेच रहे गुब्बारे

रंग-बिरंगे प्यारे प्यारे

फटे पुराने कपड़े पहने

कौन नए सिलवाएगा

 

सब बच्चे पढ़ने जाते हैं

छुट्टी हो तो घर आते हैं

ये क्यों सड़कों पर रहते हैं

कौन हमें समझाएगा

 

ऐसे बच्चे कितने सारे

बेघर हैं पर फिर भी प्यारे

इनका बचपन किसने छीना

कौन इन्हें बतलाएगा

 

कुछ सड़कों पर कुछ ढाबों में

घर में नौकर, कुछ खेतों में

पुस्तक, खेल, खिलौने गायब

वापस कौन दिलाएगा

 

क्यों न हम सब मिलकर सोचें

ये क्यों अपना बचपन बेचें

कहां छिपी हैं इनकी खुशियां

कौन खोजकर लाएगा

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Wednesday, 18 December 2019

अजब आज मौसम--बाल गीत--देवेन्द्र कुमार


अजब आज मौसम—बाल गीत—देवेन्द्र कुमार


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हैं कुहरा नदी पर

या उतरे हैं बादल

 
                                                           

है रूई का परदा

दिखाई न देता

वह बैठा है मांझी

नहीं नाव खेता

अजब आज मौसम

लगें एक जल-थल

 
 

बहुत ठंड भाई

रजाई निकालो

पखेरू ठिठुरते

उन्हें भी बुला लो

करें आज छुट्टी

किताबें पढ़ें कल

 
 
 


हवा है बरफ सी

चलो सिर बचाओ

अंगीठी गरम है

यहीं बैठ जाओ

रसोई में मम्मी

पकौड़े रही तल

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Friday, 22 March 2019

कूड़े वाला भैया--बाल गीत--देवेन्द्र कुमार


कूड़े वाला भैया==देवेन्द्र कुमार==बाल गीत

 

कूड़े वाला भैया आए

‘कूड़ा दो’- आवाज लगाए
 

झाड़ू से कूड़े को मारे

साफ-सफाई को पुचकारे

कोने कोने को चमकाकर

खुशबू का संदेश सुनाए
 

ऊपर नीचे दौड़ लगाता

रखें सफाई यह समझाता

उसका काम बहुत भारी है

आओ हम भी हाथ बंटाएं
 

दिखता है मैला ऊपर से

पर कितना उजला अंदर से

जहां जहां भी कूड़ा देखे

उसे कैद की सजा सुनाए
 

कूड़े वाला भैया आये

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