Sunday, 24 May 2020

खाली गिलास-कहानी-देवेन्द्र कुमार


खाली गिलास—कहानी—देवेन्द्र कुमार

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 सवेरे का समय था, बलवान चाय वाले की दूकान पर काफी भीड़ थी रोज की तरह। वहीँ काम करता था रमुआ। उसका काम था झूठे गिलास धोना, टेबल पर कपडा मारते रहना और आस पास की दुकानों में  चाय दे कर आना। उसका कोई नहीं था इसलिये बलवान को ही बापू कहता था। वैसे बलवान उसका कौन था, यह बात उसे मालूम नहीं थी। पर उसने बलवान को कई बार ग्राहकों से इस बारे में  कहते सुना था। वह कहता था – “अरे साहब क्या बताऊँ रमुआ की कहानी। यह तो मुझे सड़क पर रोता हुआ मिला था।
“
बस मुझे दया आ गयी और मैं इसे साथ ले आया। कई बरस हो गए तब से इसे अपने बेटे की तरह पाल रहा हूँ।”

   सुनने वाले बलवान की तारीफ़ करते और चाय पीकर चले जाते। इस बीच रमुआ  सर झुकाए काम में  लगा रहता। उसे अच्छी तरह पता था कि जरा हाथ रुके नहीं कि आफत आ जाएगी। बलवान के प्यार का कड़वा  सच उसे खूब मालूम था। बात बेबात रमुआ के गाल लाल करने में बलवान को जैसे मज़ा आता था। उसकी आँखों  में आंसू आते और सूख़ जाते, वह किस से अपना दुःख कहता, कहाँ जाता।
हर दिन एक ही ढंग से बीतता था। रात को चाय की दुकान बंद होने का कोई समय नहीं था, जब तक ग्राहक आते रहते दुकान चलती रहती, और रमुआ के हाथ और पैर भी काम में लगे रहते। वह जरा भी ढिलाई नहीं कर सकता था, फिर चाहे भूख लगी हो या सर दुःख रहा हो उसे छुटकारा नहीं मिलता था।

     एक दिन उसने भूख लगने की बात कह दी तो जोर का तमाचा गाल पर पड़ा था, एक भद्दी गाली सुनने को मिली थी। उस दिन बलवान ने साफ़ कह दिया था कि खाना दुकान का काम पूरा होने के बाद ही मिलेगा। रमुआ को पता चल गया था कि क्या बात बलवान से नहीं कहनी है। मतलब यह कि जब बलवान दे तभी खाना है, और जब छुट्टी दे तभी मेज कुर्सियों के बीच नंगी जमीन पर लेट जाना है।
  दो दिन से उसे नींद नहीं आ रही है, सर में  दर्द होता रहता है। सुबह दूध वाला आकर शटर बजाता है तो रमुआ अंदर से शटर उठा कर दूध ले लेता है। यह रोज का नियम है। दूध वाला सुबह बहुत जल्दी आ जाता है| तब तक दिन भी नहीं निकला होता है पर रमुआ का काम तभी से शुरू हो जाता है। उस दिन रमुआ को शटर उठाने में देर हो गई, पूरे बदन में  दर्द हो रहा था। उसे बुखार था। दूध वाले ने बलवान से देरी की शिकायत कर दी। फिर तो आफत ही आ गई, बलवान ने चांटों से उसके गाल लाल कर दिए। पर यह नहीं पूछा कि उठने में  देर क्यों हुई थी।

  रमुआ ने बुखार के बारे में  कुछ नहीं कहा, कहने से कुछ फायदा भी नहीं था| बुखार कोई पहली बार नहीं हुआ था। मार खाकर वह  काम में लग गया। पर काम में रोज जैसी फुर्ती नहीं थी। चाय बनाने वाले मुन्ना ने उसका हाथ छूकर देखा तो चौंक कर बोला- “ अरे, तुझे तो तेज बुखार है!” पर वह इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सका, क्योंकि बलवान उधर ही देख रहा था। मुन्ना को भी बलवान के गुस्से के बारे में खूब अच्छी तरह पता था। रमुआ की हिमायत लेकर उसे अपनी मुसीबत नहीं बुलानी थी।
  ग्राहक चाय-नाश्ते का मज़ा ले रहे थे, इस बीच रमुआ बाज़ार में भी कई बार चाय दे आया था, उसका मन कर रहा था कि गरमागरम चाय पी ले तो शायद तबीयत कुछ ठीक हो जाये, लेकिन पी नहीं सकता था।

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 तभी बलवान ने बाज़ार में चाय दे आने को कहा। रमुआ  चाय का गिलास लेकर चल दिया, वह ठीक से चल भी नहीं पा रहा था। आगे एक आदमी चबूतरे पर बैठा अखबार पढ़ रहा था, वह रमुआ को जानता था, उसे बलवान की दुकान पर लट्टू की तरह घूमते देखा था। उसने भी रमुआ के बारे में बलवान के मुंह से खुद की तारीफ कई बार सुनी थी, उसने रमुआ को डगमगाते आते देखा तो पुकार लिया – “सुन तो।” फिर बढ़ कर उसका हाथ पकड़ लिया। चौंककर बोला- “ तुझे तो तेज बुखार है,रो क्यों रहा है? चाय पी ले|’।” 
  रमुआ चुप बैठा रोता रहा पर उसने चाय नहीं पी, उसे अच्छी तरह पता था कि इसके बाद बलवान उसके साथ क्या करेगा। उस आदमी ने रमुआ के सर पर हाथ फिराया,बोला-“ तू आराम से चाय पी, फिर मैं तुझे डॉक्टर के पास ले चलूँगा, अब बलवान के पास जाने की कोई जरुरत नहीं।‘’
रमुआ एकटक उस की ओर देखता रहा, उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
....


  दुकान पर बलवान ने रमुआ को पुकारा तो मुन्ना ने कहा-‘ वह तो चाय देकर लौटा  ही नहीं है।”
सुनते ही बलवान  आग बबूला हो गया, मुन्ना से बोला-“ उसे पकड़ कर तो ला जरा, आज उसकी हड्डियाँ अच्छी तरह नरम करूंगा, तभी अक्ल ठिकाने आएगी उस बदमाश की।”
मुन्ना समझ गया कि आज रमुआ की खैर नहीं, उसने सब जगह देख डाला, पर रमुआ कहीं नहीं था। एक दुकान के चबूतरे पर चाय का खाली  गिलास रखा था। पर चाय का खाली गिलास रमुआ के बारे में यह 

बताने वाला नहीं था कि वह एक डाक्टर के क्लिनिक में था और डाक्टर उसकी जांच कर रहा था। उसे वहां ले जाने वाला आदमी उसका कौन था?शायद कोई नहीं या उसका सब कुछ।    ( समाप्त)

Monday, 27 April 2020

कमाऊ बेटा-बाल गीत --देवेन्द्र कुमार


कमाऊ बेटा—देवेन्द्र कुमार 

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कमाऊ बेटा

दुलारा, आंखों का तारा

लेटा है

यह भी एक ढंग है

कमाने का।

कुछ खास  छोटा भी नहीं

तीन माह, दस दिन का

 

मैली कथरी पर

वह और कुछ सिक्के

कुछ नहीं बोलता

आंख नहीं खोलता

 

रो रही है मां

बाप पीटता है पेट

 ‘ऐ बाबू लोगो!

सौगंध भगवान की

इसके नन्हे कलेजे में

हैं हजार छेद।

इलाज को मिल जाए

पैसा दो पैसा...’

 

किसी ने फेंके कुछ सिक्के

कोई यूं ही गुजर गया

समाज ने बांट लिया उसे

और चाहे कुछ हो न हो

सूखा कुआं

मां-बाप का

जरा तो

गीला हो ही जाएगा!

वह सहे जाएगा

धूप और तपिश

मां-बाप का दुलारा

आंखों का तारा

अभी से बन गया

लाठी

बुढ़ापा मां-बाप का

आए न आए

इसलिए चुप लेटा है

कमाऊ बेटा है।

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Monday, 24 February 2020

बच्चे गए नहीं-बाल कविता-देवेन्द्र कुमार


बच्चे गए नहीं—कविता-देवेन्द्र कुमार

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शाम ढल गई

खिलखिल थम गई

बच्चे चले गए

क्या सच?

 

नहीं वे मौजूद हैं

पेंसिलों की छीलन,

कागजी गोलियों के

झगडे और मेल में

 

घर के अखाडे में

रंगों के पौ बारह

डांट डपट जा बैठी

बचपन की रेल में

 

अब बड़े बोले

करो कूडे की सफाई 

रुक रे बड़प्पन

मैंने फटकार लगाई

 

बाँध कर रखूंगा

जाने नहीं दूंगा

मैं उनमें वे मुझमें

खेलूंगा खेल मैं  

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Saturday, 8 February 2020

देखो देखो फूल खिला-बाल गीत-देवेन्द्र कुमार


देखो देखो फूल खिला—बाल गीत—देवेन्द्र कुमार

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       कूड़े पर एक फूल खिला

       सुंदर पीला फूल खिला
 
       कैसा अद्भुत फूल खिला

       खूब खिला भई खूब खिला

 

       वहाँ गली का कूड़ा पड़ता

       बदबू   छाई   रहती   है

       सब इससे बच कर चलते हैं

       जाने  कैसे  फूल खिला

      

        कोई नहीं देखने वाला

        उसे मिला है देश निकाला

        खूब गंदगी में महका है

        कितना सुंदर फूल खिला

 

                  खूब खिला भई खूब खिला

             अजब अनोखा फूल खिला 

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Sunday, 2 February 2020

बेच रहे गुब्बारे- बाल गीत-देवेन्द्र कुमार


बेच रहे गुब्बारे—बाल गीत—देवेन्द्र कुमार

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बच्चे बेच रहे गुब्बारे

रंग-बिरंगे प्यारे प्यारे

फटे पुराने कपड़े पहने

कौन नए सिलवाएगा

 

सब बच्चे पढ़ने जाते हैं

छुट्टी हो तो घर आते हैं

ये क्यों सड़कों पर रहते हैं

कौन हमें समझाएगा

 

ऐसे बच्चे कितने सारे

बेघर हैं पर फिर भी प्यारे

इनका बचपन किसने छीना

कौन इन्हें बतलाएगा

 

कुछ सड़कों पर कुछ ढाबों में

घर में नौकर, कुछ खेतों में

पुस्तक, खेल, खिलौने गायब

वापस कौन दिलाएगा

 

क्यों न हम सब मिलकर सोचें

ये क्यों अपना बचपन बेचें

कहां छिपी हैं इनकी खुशियां

कौन खोजकर लाएगा

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Wednesday, 18 December 2019

अजब आज मौसम--बाल गीत--देवेन्द्र कुमार


अजब आज मौसम—बाल गीत—देवेन्द्र कुमार


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हैं कुहरा नदी पर

या उतरे हैं बादल

 
                                                           

है रूई का परदा

दिखाई न देता

वह बैठा है मांझी

नहीं नाव खेता

अजब आज मौसम

लगें एक जल-थल

 
 

बहुत ठंड भाई

रजाई निकालो

पखेरू ठिठुरते

उन्हें भी बुला लो

करें आज छुट्टी

किताबें पढ़ें कल

 
 
 


हवा है बरफ सी

चलो सिर बचाओ

अंगीठी गरम है

यहीं बैठ जाओ

रसोई में मम्मी

पकौड़े रही तल

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