Thursday, 31 May 2018

सारे फूल झरे --देवेन्द्र कुमार --बाल गीत


सारे फूल झरेदेवेन्द्र कुमार –बाल गीत


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पत्ते धूल भरे

देखो छांह डरे

 

मौसम करता छल

चैन नहीं इक पल

धरती सूख गई

सारे फूल झरे

 

क्या दिन क्या रातें

गर्मी की बातें

सूरज का गुस्सा

क्या क्या जुल्म करे

 

ठंड कहां बैठी

गरमी है ऐंठी

बादल आ जाएं

तब हों प्राण हरे

 

तन पर बर्फ मलो

घर से निकल चलो

पंखे बंद हुए

बिजली खेल करे

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Monday, 28 May 2018

मक्खी सब डूब मरें --देवेन्द्र कुमार --बाल गीत


मक्खी सब डूब मरें—देवेन्द्र कुमार—बाल गीत

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भोजन को मक्खी से

दूर-दूर रखना
 

मक्खी तो कूड़े पर

भिन-भिनभिनाए

गंदा कर पैरों को

फिर घर में आए
 

रोग बहुत सारे

मक्खी में रहते

इससे बचकर रहना

बाबा यों कहते
 

कूड़ा न फैले

ठहरे न पानी

तभी खत्म होगी

यह गंदी कहानी
 

बागों में फूल हंसें

तितलियां बुलाएं

मक्खी सब डूब मरें

हम गुनगुनाएं।

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Wednesday, 23 May 2018

अगर कुँए में --देवेन्द्र कुमार --बाल गीत


अगर कुएं में—देवेन्द्र कुमार –बाल गीत

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-गरम गरम मौसम में गरमी

अगर कुएं में रहने जाए

तब तो भैया बड़ा मजा हो

वह तो चौबीस घंटे नहाए

 

पानी के अंदर रहने से

उसको होगा खूब जुकाम

छींक छींक कर थक जाएगी

सो जाएगी चादर तान

 

अब आएगी छम छम बारिश

सूखे के पकड़ेगी कान                     

हरियाली का खेल चलेगा

खेतों का होगा स्नान

 

लुढकम पकडम मस्ती होगी

बारिश माँ से यों बोलेगी

तुम भी घर से बाहर आओ

बचपन की तस्वीर दिखाओ

 

माँ बोलेगी सुन री बहना

जा बच्चों से इतना कहना

भीग चुके अब तो घर जाओ

गरम पकोड़े ,हलवा खाओ

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Monday, 21 May 2018

हंस कर मिले --देवेन्द्र कुमार --बाल गीत


हंसकर मिले---देवेन्द्र कुमार –बाल गीत

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हंसकर मिले किताब

तो पढ़ना अच्छा लगता है

 
इसमें कितनी कथा-कहानी

रातों में कहती है नानी

अपने मन से पढ़ें तो पढ़ना

अच्छा लगता है

 
पुस्तक मेरी फूलों जैसी

बातें इसमें कैसी कैसी

मां बोले शाबाश

तो पढ़ना अच्छा लगता है

 
पढ़ने से उजला होता मन

आता ज्ञान किताबों से छन

हम तुम मिलकर पढ़ें तो

पढ़ना अच्छा लगता है।

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Sunday, 13 May 2018

कमाऊ बेटा --देवेन्द्र कुमार--कविता


कमाऊ बेटा—देवेन्द्र कुमार –कविता

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कमाऊ बेटा

दुलारा

आंखों का तारा

लेटा है-

यह भी एक ढंग है

कमाने का।

कुछ खास

छोटा भी नहीं

तीन माह, दस दिन का!
 

मैली कथरी पर

वह और कुछ सिक्के-

कुछ नहीं बोलता

आंख नहीं खोलता

रो रही है मां

बाप पीटता है पेट

लुंज हाथों से-

ऐ बाबू लोगो!

सौगंध भगवान की

अपने मरे ईमान की

इसके नन्हे कलेजे में

हैं हजार छेद।

पसलियां गल गईं

सुनता भी नहीं

बेजुबान है

बुखार चढ़ गया

सिर में

-सिर से ऊपर...

इलाज को मिल जाए

पैसा दो पैसा...
 

किसी ने फेंके कुछ सिक्के

कोई यूं ही गुजर गया

समाज ने बांट लिया

उसे

इलाज लाइलाज

और चाहे कुछ हो न हो

सूख कुआं

मां-बाप का

जरा तो

गीला हो ही जाएगा!

वह सहे जाएगा

धूप और तपिश

मां-बाप का दुलारा

आंखों का तारा

होनहार

अभी से बन गया

लाठी-

बुढ़ापा मां-बाप का

आए न आए

इसलिए चुप लेटा है

कमाऊ बेटा है।

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Saturday, 5 May 2018

खेल रहे बच्चे--देवेन्द्र कुमार-- बाल गीत


खेल रहे बच्चे—देवेन्द्र कुमार –बाल गीत

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फूलों संग हंसते

सुंदर हैं दिखते

आंखों में उनकी

सपने हैं कच्चे
 

बिना पंख उड़ते

बिना बात लड़ते

कोई कुछ भी बोले

मन के हैं सच्चे
 

सबके सब प्यारे

मां के दुलारे

बातें तो बड़ी-बड़ी

करते हैं बच्चे
 
खेल रहे बच्चे।

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Friday, 4 May 2018

खट मिठ प्यार--देवेन्द्र कुमार--बाल गीत

 
खटमिठ प्यार—देवेन्द्र कुमार –बाल गीत

 
अपन तुपन का खटमिठ प्यार

 
मेरे पापा तेरे पापा

कितने अच्छे दोस्त पुराने

फिर भी हम लड़ते रहते हैं

ऐसा क्यों है मेरे यार

 
पास-पास हम दोनों के घर

सुबह शाम मिलते हैं छत पर

छोटी सी टाफी को लेकर

क्यों फिर की हमने तकरार

 
रेस हुई तू अव्वल आया

मैंने टंगड़ी मार गिराया

उलट-पलट फिर कैसे तूने

मेरे बदले खाई मार

 
अपन-तुपन का खटमिठ प्यार।

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खट मिठ प्यार --देवेन्द्र कुमार --बाल गीत


खटमिठ प्यार—देवेन्द्र कुमार –बाल गीत

 
अपन तुपन का खटमिठ प्यार

 
मेरे पापा तेरे पापा

कितने अच्छे दोस्त पुराने

फिर भी हम लड़ते रहते हैं

ऐसा क्यों है मेरे यार
 

पास -पास हम दोनों के घर

सुबह शाम मिलते हैं छत पर

छोटी सी टाफी को लेकर

क्यों फिर की हमने तकरार

 
रेस हुई तू अव्वल आया

मैंने टंगड़ी मार गिराया

उलट-पलट फिर कैसे तूने

मेरे बदले खाई मार
 

अपन-तुपन का खटमिठ प्यार।

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बड़े हो गए हम --देवेन्द्र कुमार --बाल गीत


बड़े हो गए हम—देवेन्द्र कुमार –बाल गीत  
 
लोरी भूले कान हमारे
हम थे मां के राजदुलारे
बिछड़ गए जितने भी साथी
प्यार हुआ कुछ कम
 
पापा कहते यह कर, वह कर
मम्मी कहती मत जा छत पर
मन कहता जी चाहे जो कर
ना था कोई गम।
 
कूदफांद और छिपमछिपाई
कुट्टम कुट्टा खूब लड़ाई
भूले दिन जब याद किए तो
आंख हुई है नम।
बड़े हो गए हम
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Thursday, 3 May 2018

काला पैसा --गोरा पैसा --देवेन्द्र कुमार --बाल गीत


काला पैसा-गोरा पैसा==देवेन्द्र कुमार ===बाल गीत


 

हर कोई मांगे पैसा भैया

कैसा अजब तमाशा जी
 
ऊपर पैसा नीचे पैसा

काला पैसा गोरा पैसा

अब तो सिर्फ चलेगा पैसा

बोलें सब यह भाषा जी

कैसा अजब तमाशा जी

 
है पैसे की मारा-मारी

उलझ गई है दुनिया सारी

चाहे कैसे भी मिल जाए

रहती हरदम आशा जी

कैसा अजब तमाशा जी

 
प्रेम -प्यार और भाई चारा

इनको तो लालच ने मारा

बीज द्वेष के पैसा बोए

सबको हुई हताशा जी

कैसा अजब तमाशा जी

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